Friday, March 20, 2009

चुनाव भारत-भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर हैं

पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के प्रति समर्पित राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत हैं
पार्टी और विचारधारा को तिलांजलि देकर राजनेता चुनाव की इस तरह तैयारियां कर रहे दिखते हैं मानो भारत की संसद में प्रवेश राष्ट्र पर छाए संकटों के समाधान के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत ऐश्वर्य और सत्ता सुख में हिस्सेदारी के लिए हो। जिस प्रकार टिकटों की बिक्री और चुनाव खर्च के लिए इकट्ठा किए जा रहे धन का ब्यौरा सामने आ रहा है उससे तो यही अंदाजा लगता है कि देश अभी भी उन राजनेताओं की प्रतीक्षा में है जो चुनावी अखाड़े को पूंजी निवेश का लाभप्रद क्षेत्र मानने के बजाय अपने हितों को दांव पर लगाते हुए राष्ट्रीय हितों को आंखों में धारण कर सत्ता के सूत्र संभालेंगे। भारत विभाजन के बाद से आज तक राजनीति दुराचरण के धब्बों से कलंकित रही है। 1947 में जब भारतीय सैनिक कश्मीर पर अचानक धोखे से हुए पाकिस्तानी हमले झेल रहे थे तो लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्णामेनन से जुड़ा जीप घोटाला हुआ। फिर मूंदड़ा कांड, नागरवाला और बोफोर्स कांड, सुखराम मामला, चारा घोटाला, तहलका, पनडुब्बी खरीद, गेहूं आयात घोटाला जैसे प्रकरण राजनेताओं की साख पर आंच डालते रहे।
एक ओर सामान्य नागरिक दुनिया भर में अपनी व्यक्तिगत मेधा और निपुणता के बल पर भारतीय पहचान को श्रेष्ठता का सर्वोच्च स्थान दिला रहे थे और भारतीय कंपनियां विश्वविख्यात ब्रांड अधिग्रहीत कर रही थीं तो दूसरी ओर राजनेता बोरियां भर-भर कर नोट इकट्ठा कर अपनी आत्मा के बजाय तिजोरी के निर्देश पर भारतीय संसद में सांसद धर्म निभाने का परिदृश्य उपस्थित कर रहे थे। क्या ऐसे टिकाऊ और बाजारू लोगों के सौदों पर टिकी सरकार चुनना राष्ट्रहित में होगा? जिस देश की प्रजा अपने शासक को चुनने में लापरवाही बरते या उसका चुनाव जाति, भाषा और धनबल के प्रभाव की कसौटी पर करे, क्या उसका कभी अच्छा परिणाम निकल सकता है?
कुछ ऐसी स्थिति पिछली शती के प्रारंभ में ब्रिटेन में थी, जब हाउस आफ ला‌र्ड्स की सीटें नीलाम हुआ करती थीं। फिर भी वहां की जनता ने अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को बदला और एक ऐसे प्रजातंत्र का ढांचा मजबूत किया जो राज-वंश भी परंपरागत रूप से जीवित रखे हुए है और जहां प्रखर राष्ट्रवाद हर नीति को निर्देशित करता है। अमेरिका और चीन भी भले ही परस्पर अत्यंत भिन्न समाज हों, लेकिन अपने देश को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ, समृद्ध और शक्तिशाली बनाना वहां की राजनीति का मुख्य धर्म परिलक्षित होता है। भारत के सामने आसन्न चुनावों ने यह चुनौती उपस्थित की है कि जनता ऐसे सांसदों को चुने जो राष्ट्र-धर्म के प्रति सजग और प्रतिबद्ध हों। दुर्भाग्य से वर्तमान चुनाव पद्धति में सिर्फ जीतना ही एकमात्र कसौटी है, चरित्र और गुण का स्थान यदि कभी आया भी तो बाद में आता है। फलत: ऐसे सांसद चुने जाते हैं जिन्हें न अपने देश के इतिहास का ज्ञान होता है, न भूगोल का और न ही राष्ट्रीय संघर्ष के विभिन्न सोपानों से वे परिचित होते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनसे पहले भी अनेक मंत्री हो चुके हैं, जिनमें से कोई भी अपने धनबल और असीम ऐश्वर्य के कारण यशस्वी नहीं हुआ। केवल पैसा और पद कभी प्रतिष्ठा नहीं दिला सकते।
जिन लोगों को सत्ता के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के बाबू और रायबहादुर बनने में शर्म नहीं आई, वैसे ही लोग आज विदेशी हितों और विदेशी मूल के नेतृत्व के सामने झुककर राष्ट्रीयता दांव पर लगा रहे हैं। जिस देश में पांच लाख देशभक्त नागरिक निर्वासित कर दिए गए हों, जहां एक करोड़ से अधिक विदेशी अवैध घुसपैठिए वोट बैंक राजनीति का संरक्षण पा रहे हों, जहां शासक को पुलिस, प्रशासन और चुनाव पद्धति में सुधार की कोई आवश्यकता ही महसूस न हो, बल्कि ब्रिटिश काल के कानून आज भी देश में लागू हों, ऐसे देश में यथास्थिति के दब्बूपन के बजाय जन-विद्रोह के परिवर्तनकारी स्वर बुलंद होने चाहिए। देश को ऐसी राजनीति चाहिए जो शत्रु के प्रति निर्गम और प्रतिशोधी हो, जो देश को सैन्य दृष्टि से विश्व में सबसे सबल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो तथा नि:संकोच भाव से अपने अगल-बगल के क्षेत्र पर ऐसा प्रभुत्व स्थापित करे ताकि वहां की अराजकता और तालिबानी शरारतों का हम पर असर न पड़े। चारों ओर से पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे असफल और अराजकता ग्रस्त देशों से घिरे भारत को आंतरिक और सीमावर्ती शांति के लिए ऐसा सैन्य और कूटनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना ही होगा जिसे देखकर विरोधी भयभीत रहें। आज तो पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं, श्रीलंका व नेपाल तक हमारी सुरक्षा और संवेदना की कद्र नहीं करते।
चीन के बढ़ते क्षेत्रीय विस्तार के प्रति राजनीतिक दलों में कोई दीर्घकालिक सर्वसम्मत चिंतन ही नहीं है। तीस करोड़ से अधिक भारतीय आज भी गरीबी रेखा से नीचे पशुवत जीवन बिताने पर विवश हैं। गत दस वर्षों में दो लाख किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। खेती में रासायनिक खाद और जीन अंतरित बीज के जहर फैल रहे हैं। देश की कृषि योग्य भूमि पर सिनेमा, होटल और कारखाने लगाने की अनुमति देकर अमीरों को और ज्यादा अमीर तथा भूमिपति किसानों को स्लमडाग बनाया जा रहा है। ऐसे ही सांसद फिर चुने जाएं तो किस प्रकार के भारत का वे निर्माण करेंगे? भारत एक ऐसे नेतृत्व की प्रतीक्षा में है जो सबसे बड़ा तीर्थत्व गुण और शक्ति संचय में माने, जिसके प्रेरणा केंद्र और मन भारत में हों, जो दरिद्रता निवारण और विज्ञान-प्रौद्योगिकी प्रसार को देवालय निर्माण जैसा महत्वपूर्ण माने, जिसके सर्वोच्च आराध्य भारत के नागरिक हों। वर्तमान चुनाव हमें भारत भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर दे रहे हैं-एक ऐसा भारत भाग्य विधाता चुनें जो सच में जन-गण-मन का अधिनायक बन सके।

क्या हम परिवर्तन के लिए तैयार हैं?
लेखक - तरुण विजय

क्या तालिबान के ताण्डव से बच पायेगा हिन्दुस्तान?


जिस तरह से तालिबान और पाकिस्तान शासन में बैठे तालिबानी शासक पुरे पाकिस्तान को लगभग तालिबानिस्तान बना दिया है। आज पाकिस्तान का स्थिती ऎसा है कि वहाँ रह रहे मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग इस्लाम के नाम पर तालिबान का खुले आम समर्थन कर रहें है और वहाँ का सरकार भी आँख बन्द कर समर्थन कर रहा है। और पाकिस्तान से बाहर रह रहें मुस्लिम समप्रदाय भी किसी न किसी तरह तालिबान का समर्थन कर ही रहा है। तालिबान का सपना है पुरे विश्व को दारुल इस्लाम बनाने का इसके लिये इसके लिये तालिबान गैर इस्लामिक समुदाय को या तो डरा-धमका कर इस्लाम कबूलबा कर या फिर मौत के घाट उतार कर दारुल इस्लाम का सपना साकार करने में लगा है।
हिन्दुस्तान के दो परोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनो देश में इस्लाम का शासन है बांग्लादेश जब पाकिस्तान के आतंक से त्रस्त था तब हिन्दुस्तान के शरण में आया था लेकिन आजादी के कुछ दिन बाद से बांग्लादेश को अपने इस्लामिक भाईचारा का ख्याल हो आया और हिन्दुस्तान का साथ छोड़ इस्लामिक भाई पाकिस्तान का दामन थाम लिया और पाकिस्तान का कसम हिन्दुस्तान को बर्बाद करके दम लुगा को सार्थक करने में लग गया। और किसी ना किसी तरह से हिन्दुस्तान को परेशान करने लगा चाहे जिहाद हो, आंतकवाद हो, नकली नोट या फिर बांग्लादेशी नागरीक को अवैध रुप से हिन्दुस्तान में भेज कर मुग्लिस्तान बनाने में पाकिस्तान का सहयोग देना हो। इन सब स्थिती में हिन्दुस्तान क्या करेगा।
हिन्दुस्तान में राजनीतिक दल मुस्लमानों के चन्द वोट के चलते हिन्दुस्तान के आने वाले खतरे को हमेशा से अनदेखा करते रहें है। जब भाजपा सरकार आयी थी तो आतंकवाद विरोधी कानुन टाडा और पोटा लगाया था जिसको की कांग्रेस की सरकार ने मुस्लमानों के दवाब के चलते हटा दिया। आतंकवाद निरोधक कानून किसी एक विशेष समुदाय के लिये नही बनाया गया था ये कानून समान रुप से हिन्दु और मुस्लिम दोनो के लिये था लेकिन मुस्लमानों को इस कानून से ज्यादा समस्या था जिसके कारण कांग्रेस सरकार जब बना तो सबसे पहला काम आंतकवाद निरोधक कानून को हटाने का किया जिसका नतिजा आज पुरा हिन्दुस्तान भोग रहा है आज हिन्दुस्तान का कोई शहर, कस्बा, गाँव आतंकवादियों से सुरक्षीत नही है। कही भी कभी भी इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट किया जा सकता है। आज की तारिख में विश्व में सबसे ज्याद इस्लामिक आतंकवादी सुरक्षित है तो वह देश है हिन्दुस्तान। अफजल गुरु इसका उदाहरण है फांसी की सजा मिलने के बाद भी अफजल को कांग्रेस सरकार के द्वारा सिर्फ इस लिये फांसी नही दिया कि इस से मुस्लिम समुदाय खफा हो जायेगा और कांग्रेस को वोट नही देगा। हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लमानों का किसी ना किसी रुप से इस्लामिक आंतकवाद को सर्मथन दिया जा रहा है। पाकिस्तान तो सिर्फ अपने यहाँ आतंकवादियों को विस्फोट करना सिखाया जाता है लेकिन हिन्दुस्तान में आकर उसी आतंकवादि को हर तरह का सुविधा मुहय्या किया जाते है। इस्लामिक आतंकवाद हिन्दुस्तान में आकर कही भी घर लेकर रह सकता है और उसको सहयोग करने वाले और विस्फोट के बाद बचाव करने वाले लगभग हर राजनितीक दल में मौजुद है और उनके समर्थक खुले आम घुम रहें हैं और चुनाव के दिन मुस्लिम समुदाय सिर्फ उन्ही दल को वोट देता है जिनके आने से आतंकवाद और हिन्दुस्तान को दारुल इस्लाम बनाने में सहयोग मिलता रहें।
तालिबान के पाकिस्तान और बांग्लादेश पर कब्जा करने के बाद तालिबान क्या चुप बैठेगा। शायद नही उसका अगला निशाना जरुर हिन्दुस्तान होगा। और हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लिम समुदाय इस्लामिक भाईचारा के नाम पर हो सकता है कि वे तालिबानियों के साथ करें हो जायें क्यों की आजादी के इतने सालों बाद भी मुस्लमानों का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा है हिन्दुस्तान से इसका उदाहरण है क्रिकेट का मैच जब भी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का मैच होता है तो मुस्लिम समुदाय हमेशा से पाकिस्तान के सर्मथन में खरा रहता है। अभी कुछ दिन पहले जब हिन्दुस्तान 20-20 का विश्व कप के फाइनल में पाकिस्तान को औकाद बता कर 20-20 विश्व चैंम्पियन बना तो हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लिम समुदाय को पाकिस्तान का हिन्दुस्तान के हाथों हारना नागावार लगा जिसका नतिजा कई जगह दंगा भड़का। जब हिन्दुस्तान में तालिबान का इस्लामिक ताण्डव भडकेगा उस स्थिती में हमारे देश के शासक और हमारा फौज क्या इस स्थीती में रहेगा कि तालिबानीयों से और हिन्दुस्तान में रह रहें तालिबानी सर्मथको से लोहा ले सकेगा। कांग्रेस के इस पाँच साल के शासन काल में हम लोगों ने देखा की हिन्दुस्तान से नेपाल जैसा पिद्दी सा देश भी नही डरा। मुम्बई धमाका के बाद कि स्थिती तो हिन्दुस्तान के शासको के लिये हास्यपद बन गया है पाकिस्तान हिन्दुस्तान को लतिया रहा है और हमारे शासक नित्य नयें बहाने बना कर मुम्बई हमालाबरों को बचाने के कोशीश कर रहें हैं तो क्या हमारे मुस्लिम चापलुस शासको के पास इतना हिम्मत होगा की तालिबान का सफाया हमारे देश से कर सकें।
सोचों

Tuesday, February 24, 2009

सबसे अधिक ऑस्कर जीतने वाली फिल्में

लॉस एंजेलिस। वर्ष 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स:द रिटर्न ऑफ द किंग’, 1997 में प्रदर्शित ‘टाइटेनिक’ और 1959 में प्रदर्शित ‘बेन हुर’ ने अब तक सबसे अधिक 11-11 ऑस्कर अपनी झोली में डाले हैं।
यहां ऐसी फिल्मों की सूची दी जा रही है जिन्होंने आठ या उससे अधिक ऑस्कर जीते हैं।
  1. द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिटर्न ऑफ द किंग (2003)-11 ऑस्कर
  2. टाइटेनिक (1997)-11 ऑस्कर
  3. बेन हुर (1959)-11 ऑस्कर
  4. वेस्ट साइड स्टोरी (1961)-10ऑस्कर
  5. द इंग्लिश पेशेंट (1996)- 9 ऑस्कर
  6. गिगी (1958)- 9 ऑस्कर
  7. स्लमडॉग मिलियनेयर (2009)- 8 ऑस्कर
  8. द लॉस्ट एंपरर (2008)- 9 ऑस्कर
  9. एमेड्यूस (1984)- 8 ऑस्कर
  10. गांधी (1982)- 8 ऑस्कर
  11. काबारेट (1972)- 8 ऑस्कर
  12. माई फेयर लेडी (1964)- 8 ऑस्कर
  13. ऑन द वाटरफ्रंट (1954)- 8 ऑस्कर
  14. फ्राम हीयर टू इटर्निटी (1953)- 8 ऑस्कर
  15. गॉन विद द विंड्स (1939)- 8 ऑस्कर।

जय हो रहमान


लॉस एंजेलेस के कोडेक थिएटर में भारतीय संगीतकार एआर रहमान की जय हो गई है और उन्हें दो ऑस्कर पुरस्कार मिले हैं।रहमान को 81 वें ऑस्कर समारोह मई स्लमडॉग मिलियनेयर के संगीत के लिए और इसी फ़िल्म में उनके गीत जय हो के लिए ऑस्कर दिया गया है. ये भारत के लिए गर्ब की बात है की एआर रहमान ऑस्कर पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय संगीतकार बने। इससे पहले भारत की भानु अथैया को गांधी फ़िल्म की वेशभूषा के लिए ऑस्कर मिला था जबकि सत्यजीत रे को लाइफ़टाइम एचीवमेंट के लिए ऑस्कर दिया गया था।

सकारात्मक सोच

अपने सोच को सकारात्मक बनाइये,

यह विपरीत परिस्थिति मैं आपकी मदद करेगा,

नकारात्मक सोच से बचिए,

यह सही परिस्थिति को भी आपके ख़िलाफ़ कर देता है।

Monday, February 16, 2009

खुफिया सफलता की विफलता


राज्य पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसी प्रत्येक जानकारी पर कार्रवाई करनी चाहिए जो उन्हें मिलती है. उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि प्राप्त खुफिया जानकारी कार्रवाई के लायक नहीं है. सभी स्तरों पर पूरे मनोयोग के साथ सहयोग के बिना आतंकवाद का मुकाबला कारगर ढंग से नहीं किया जा सकता.’
छह जनवरी को आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अगर ये बात कही तो इसकी वजह साफ थी. वे जानते थे कि मुंबई हमले से पहले मिली अहम खुफिया सूचनाओं की उपेक्षा की गई थी. ये सूचनाएं देश की अलग-अलग खुफिया एजेंसियों की फाइलों में दबी रह गईं थीं. प्रधानमंत्री ये भी जानते थे कि 26 नवंबर को मुंबई हमले के दो महीने पहले से मिल रही खुफिया जानकारियों का अगर ठीक से विश्लेषण किया जाता तो वरिष्ठ अधिकारियों को साफ पता चल जाता कि आतंकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई आएंगे और फाइवस्टार होटलों को निशाना बनाएंगे.
मगर ये जानकर आप चौंक जाएंगे कि मुंबई हमले के दौरान आतंकियों ने जिन मोबाइल फोन्स का इस्तेमाल किया उनके सिमकार्ड भारतीय एजेंसियों द्वारा ही लश्कर-ए-तोएबा तक पहुंचाए गए थे. एक सीक्रेट मिशन के तहत किए गए इस काम का मकसद था इन नंबरों की निगरानी के जरिए आतंकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखना. इस मिशन के पहले हिस्से को भारतीय एजेंसियों ने सफलता से अंजाम दिया. मगर विंडबना देखिए कि नजर रखने वाली आंखों को इसके बाद नींद आ गई.
नई दिल्ली स्थित उच्च पदस्थ सूत्रों से तहलका को एक सीक्रेट नोट के बारे में जानकारी मिली है जो मुंबई हमले से कम से कम पांच दिन पहले इंटेलीजेंस ब्यूरो यानी आईबी को भेजा गया था और जिसमें 35 मोबाइल फोन नंबरों का जिक्र किया गया था. नोट के मुताबिक लश्कर के कार्यकर्ताओं ने इनमें से 32 नंबरों के सिमकार्ड्स कोलकाता और तीन के दिल्ली से खरीदे थे और इन्हें नवंबर के मध्य तक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुंचा दिया गया था.
इस सीक्रेट नोट में जो कहा गया है उससे ज्यादा सीधा संकेत और कुछ नहीं हो सकता -‘नीचे दिए गए नंबर कोलकाता से खरीदे गए हैं और कश्मीर में मौजूद पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकियों के जरिए उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर पहुंचाया गया है। हो सकता है कि बाद में देश के दूसरे हिस्सों में इन नंबरों का इस्तेमाल हो. इन नंबरों पर निगरानी रखने की जरूरत है.’ नोट में आगे कहा गया है, ‘निगरानी के अलावा इन नंबरों पर होने वाली बातचीत, इनकी वर्तमान स्थिति और इनके कॉल डीटेल्स की जानकारियां जुटाना भी जरूरी है ताकि इस सूचना की दिशा में आगे बढ़ा जा सके. निगरानी कोलकाता से संभव है.’

तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक इंटेलीजेंस ब्यूरो को ये अहम सूचना 21 नवंबर यानी मुंबई हमले से पांच दिन पहले ही मिल चुकी थी. प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी जानते हैं कि पूरे पांच दिनों तक इस सूचना पर कोई अमल नहीं हुआ यानी इन नंबरों की कोई निगरानी नहीं हुई. ये भूल इसलिए और भी गंभीर हो जाती है कि इन सभी नंबरों में से कम से कम तीन ऐसे थे जिनका इस्तेमाल मुंबई पर हमला करने वाले आतंकियों ने पाकिस्तान में मौजूद अपने आकाओं से संपर्क में रहने के लिए किया था.
तर्क दिया जा सकता है कि हो सकता है आतंकियों ने मुंबई पहुंचने के बाद ही इन नंबरों को एक्टिवेट किया हो. मगर उससे इस लापरवाही की गंभीरता जरा भी कम नहीं होती कि ये पता होने पर भी कि सिमकार्ड्स आतंकियों को भेजे गए हैं, उन नंबरों की निगरानी नहीं की गई.
आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में बोलते हुए शायद प्रधानमंत्री के दिमाग में यही बात सबसे ऊपर थी. शायद तभी उन्होंने जोर देकर कहा कि हर तरह की खुफिया सूचना कार्रवाई के लायक होती है और ये उस सूचना पर काम करने वाले की क्षमता और चतुराई पर निर्भर करता है कि क्या वह पहेली जसी सूचना एक ऐसी संपूर्ण जानकारी में बदल सकती है जिसके आधार पर कार्रवाई की जा सके. प्रधानमंत्री को इस बात का अहसास था कि मुंबई हमले से जुड़ी अहम सूचना पहले से ही उपलब्ध थी जिसका अगर ठीक से विश्लेषण किया जाता तो हमले को रोका जा सकता था. मगर एजेंसियां इन अहम नंबरों की निगरानी करने में नाकाम रहीं.
पिछले साल 18 सितंबर को रिसर्च एंड एनालिसस विंग (रॉ) ने सेटेलाइट फोन पर हुई एक बातचीत रिकॉर्ड की थी जिससे साफ संकेत मिलता था कि गेटवे ऑफ इंडिया स्थित एक होटल को निशाना बनाने की तैयारी हो रही है. इस बातचीत से ये भी पता चलता था कि हमले के लिए समुद्री रास्ते का इस्तेमाल हो सकता है. 24 सितंबर को फिर से रॉ ने एक बातचीत रिकॉर्ड की. इस बार तो होटलों के नाम का भी उल्लेख हुआ था और इनमें ताज, सी रॉक और मैरियट शामिल थे. यानी साफ हो गया था कि मुंबई में होटलों पर हमला होगा और इसके लिए समुद्र का इस्तेमाल किया जाएगा.
चूक सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी. 19 नवंबर को रॉ ने फिर से एक बातचीत रिकॉर्ड की जिसमें एक शख्स कह रहा था, ‘हम 9 से 11 बजे के बीच मुंबई पहुंचेंगे.’ हड़बड़ाए अधिकारियों ने उस शख्स की स्थिति का पता लगाने की कोशिश की और पता चला कि वह मुंबई के पास स्थित समुद्री क्षेत्र में कहीं मौजूद था. रॉ ने ये अहम सूचना इंटेलीजेंस ब्यूरो को भेजी जिसने इसे संबंधित नौसेना अधिकारियों को भेज दिया.
मगर इसके बावजूद आतंकी मुंबई पहुंचने में कामयाब हो गए. उन्होंने एमवी कुबेर नाम के एक ट्रॉलर का अपहरण किया और मुंबई के दक्षिणी हिस्से में स्थित बधवार पार्क पर उतरे. विडंबना देखिए कि समय लगभग वही रहा जो उन्होंने तय किया था यानी रात 9 से 11 बजे के बीच. बल्कि देखा जाए तो वे इससे थोड़ा पहले ही पहुंच गए थे. विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को सबूतों की जो फाइल सौंपी है उसमें आतंकवादियों के मुंबई पहुंचने का वक्त रात के साढ़े 8.30 बजे बताया गया है. इसके मुताबिक आतंकियों ने एमवी कुबेर नाम के जिस ट्रॉलर का अपहरण किया था वह 26 नवंबर को शाम चार बजे मुंबई से चार नॉटिकल माइल्स की दूरी पर पहुंचा. अंधेरा होने पर आतंकियों के सरगना इस्माइल खान ने पाकिस्तान में मौजूद अपने आका से संपर्क किया जिसने उसे कुबेर के कप्तान अमर सिंह सोलंकी को खत्म करने का निर्देश दिया. सोलंकी की हत्या करने के बाद आतंकी अपने हथियारों के साथ एक बोट में सवार हुए और लगभग सवा घंटे में चार ना¬टिकल माइल्स की दूरी तय करके बधवार पार्क पहुंच गए.
अगर सीक्रेट नोट के मिलते ही सक्रियता दिखाते हुए नंबरों की निगरानी का काम शुरू कर दिया जाता तो हो सकता था कि आतंकियों के इन नंबरों के एक्टिवेट होते ही उनका पता चल जाता.
मगर सूत्रों के मुताबिक सीक्रेट नोट और उसमें दिए गए नंबरों का तो किसी को ख्याल ही नहीं था. अजमल कसाब और उसके साथियों द्वारा सीएसटी में 58 लोगों और एटीएस मुखिया हेमंत करकरे सहित दो अधिकारियों की हत्या और नरीमन हाउस, ताज और ओबेरा¬य पर कब्जा जमा लेने के बाद आईबी में किसी की तंद्रा टूटी और उसे ध्यान आया कि कुछ दिन पहले कोई जानकारी आई थी जिसमें कुछ नंबरों का जिक्र था. आनन-फानन में कोलकाता फोन घुमाया गया. जो पता चला उससे सबके होश उड़ गए. निगरानी के लिए भेजे गए उन 35 नंबरों में से कम से कम तीन ऐसे थे जिनका मुंबई में मौत की बरसात कर रहे आतंकी इस्तेमाल कर रहे थे.
तब कहीं जाकर मुंबई पुलिस को खबरदार किया गया और इन नंबरों पर हो रही बातचीत को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया शुरू की गई. पाकिस्तान को सौंपे गए सबूतों में इस बात पर जोर दिया गया है कि वहां स्थित अपने आकाओं के संपर्क में रहने के लिए आतंकी मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे थे. सबूतों की फाइल में एक जगह पर कहा गया है, ‘अलग-अलग इमारतों पर कब्जा करने के बाद और सुरक्षा बलों से मुठभेड़ के दौरान भी आतंकी मोबाइल फोन पर अपने आकाओं के संपर्क में थे. उन्होंने बंधकों/पीड़ितों के फोन का भी इस्तेमाल किया.’
ताज होटल पर कब्जे के कुछ देर बाद ही भारतीय एजेंसियों ने आतंकियों के मोबाइल फोन पर होने वाली बातचीत रिकॉर्ड की थी. इसके कुछ अंश सबूतों की फाइल में भी हैं. बातचीत को आतंकियों की स्थिति और समय के आधार पर सूचीबद्ध किया गया है. इसे देखकर पता चलता है कि रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया 26 नहीं बल्कि 27 नवंबर यानी हमले के दूसरे दिन शुरू हुई. मसलन बातचीत का नीचे दिया गया हिस्सा 27 नवंबर को रात एक बजकर 26 मिनट पर रिकॉर्ड किया गया है.
कॉलर- आग लगा रहे हो या नहीं?
रिसीवर- अभी नहीं, मैं मैट्रेस को जलाने लायक बना रहा हूं.
कॉलर- तुमने लाश के साथ क्या किया? (इशारा शायद कुबेर के कप्तान सोलंकी की तरफ है)
रिसीवर- वहीं छोड़ दिया.कॉलर- क्या तुमने पानी के लिए ला¬क खोले थे (ट्रॉलर के तल पर स्थित ला¬क जिनके खुल जाने पर पानी भीतर आ सकता है और ट्रॉलर डूब
सकता है.)रिसीवर- नहीं, लॉक नहीं खोले थे. जल्दबाजी में हमने उन्हें वसे ही छोड़ दिया. हमसे एक बड़ी गलती हो गई.
कॉलर- बड़ी गलती? क्या?
रिसीवर- जब हम बोट में सवार हो रहे थे तो लहरें काफी ऊंची थीं. एक दूसरी नाव दिखाई दी. सब कहने लगे कि नेवी वाले आ गए. जल्दबाजी में सब(ट्रॉलर से) कूद गए. इस हड़बड़ी में इस्माइल का सेटेलाइट फोन छूट गया.
गलती करने वाले आतंकी अकेले नहीं थे. भारतीय खुफिया एजेंसियां भी इस मामले में कदम-कदम पर उनके साथ थीं. इस बातचीत से साफ हो जाता है कि आतंकियों के आका अगर मुंबई में भी उनसे संपर्क रख पाए तो इसलिए क्योंकि उनकी योजना में भारत से सिमकार्ड्स जुटाना भी शामिल था. दुर्भाग्य से खुफिया एजेंसियों के पास इन नंबरों की जानकारी थी मगर इन पर नजर नहीं रखी गई.
लापरवाही भरा यही रवया भारत को एक आसान शिकार बना देता है.
गुप्त अभियान आतंकियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाने की दिशा में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं. इस मामले में अभियान के पहले हिस्से यानी लश्कर तक सिमकार्ड्स पहुंचाने के काम को तो सफलता से अंजाम दिया गया मगर लापरवाही के चलते दूसरे हिस्से यानी इन सिमकार्ड्स की निगरानी की उपेक्षा हो गई.
विडंबना ही है कि आत्ममंथन और गलती स्वीकारने व सुधारने की बजाय दोष एक दूसरे पर थोपने का सिलसिला शुरू हो गया है. सिमकार्ड्स उपलब्ध करवाने के लिए आईबी, जम्मू और कश्मीर पुलिस को दोषी ठहरा रही है. जबकि सच ये है कि जम्मू और कश्मीर पुलिस ने तो अपना काम करते हुए इन नंबरों की जानकारी आईबी तक पहुंचा दी थी जो इनकी निगरानी नहीं कर पाई. सिमकार्ड्स के लिए श्रीनगर से कोलकाता जाने वाले जम्मू और कश्मीर पुलिस के कांस्टेबल मुख्तार अहमद को जेल में डाल दिया गया. इतना ही नहीं आनन-फानन में सारे मोबाइल नंबरों को निगरानी पर रखने की बजाय (जिससे कोई दूसरी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती थी) अस्थायी तौर पर निष्क्रिय कर दिया गया.
मुंबई हमले के बाद सरकार ने अपने विश्वसनीय सबूतों के साथ पाकिस्तान के खिलाफ व्यापक कूटनीतिक अभियान छेड़ दिया है. ऐसा ही एक व्यापक अभियान खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली की दिशा में भी छेड़े जाने की जरूरत है ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि अलग-अलग एजेंसियां मिलजुलकर एक मकसद के लिए काम करें.