Tuesday, February 24, 2009

सबसे अधिक ऑस्कर जीतने वाली फिल्में

लॉस एंजेलिस। वर्ष 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स:द रिटर्न ऑफ द किंग’, 1997 में प्रदर्शित ‘टाइटेनिक’ और 1959 में प्रदर्शित ‘बेन हुर’ ने अब तक सबसे अधिक 11-11 ऑस्कर अपनी झोली में डाले हैं।
यहां ऐसी फिल्मों की सूची दी जा रही है जिन्होंने आठ या उससे अधिक ऑस्कर जीते हैं।
  1. द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिटर्न ऑफ द किंग (2003)-11 ऑस्कर
  2. टाइटेनिक (1997)-11 ऑस्कर
  3. बेन हुर (1959)-11 ऑस्कर
  4. वेस्ट साइड स्टोरी (1961)-10ऑस्कर
  5. द इंग्लिश पेशेंट (1996)- 9 ऑस्कर
  6. गिगी (1958)- 9 ऑस्कर
  7. स्लमडॉग मिलियनेयर (2009)- 8 ऑस्कर
  8. द लॉस्ट एंपरर (2008)- 9 ऑस्कर
  9. एमेड्यूस (1984)- 8 ऑस्कर
  10. गांधी (1982)- 8 ऑस्कर
  11. काबारेट (1972)- 8 ऑस्कर
  12. माई फेयर लेडी (1964)- 8 ऑस्कर
  13. ऑन द वाटरफ्रंट (1954)- 8 ऑस्कर
  14. फ्राम हीयर टू इटर्निटी (1953)- 8 ऑस्कर
  15. गॉन विद द विंड्स (1939)- 8 ऑस्कर।

जय हो रहमान


लॉस एंजेलेस के कोडेक थिएटर में भारतीय संगीतकार एआर रहमान की जय हो गई है और उन्हें दो ऑस्कर पुरस्कार मिले हैं।रहमान को 81 वें ऑस्कर समारोह मई स्लमडॉग मिलियनेयर के संगीत के लिए और इसी फ़िल्म में उनके गीत जय हो के लिए ऑस्कर दिया गया है. ये भारत के लिए गर्ब की बात है की एआर रहमान ऑस्कर पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय संगीतकार बने। इससे पहले भारत की भानु अथैया को गांधी फ़िल्म की वेशभूषा के लिए ऑस्कर मिला था जबकि सत्यजीत रे को लाइफ़टाइम एचीवमेंट के लिए ऑस्कर दिया गया था।

सकारात्मक सोच

अपने सोच को सकारात्मक बनाइये,

यह विपरीत परिस्थिति मैं आपकी मदद करेगा,

नकारात्मक सोच से बचिए,

यह सही परिस्थिति को भी आपके ख़िलाफ़ कर देता है।

Monday, February 16, 2009

खुफिया सफलता की विफलता


राज्य पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसी प्रत्येक जानकारी पर कार्रवाई करनी चाहिए जो उन्हें मिलती है. उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि प्राप्त खुफिया जानकारी कार्रवाई के लायक नहीं है. सभी स्तरों पर पूरे मनोयोग के साथ सहयोग के बिना आतंकवाद का मुकाबला कारगर ढंग से नहीं किया जा सकता.’
छह जनवरी को आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अगर ये बात कही तो इसकी वजह साफ थी. वे जानते थे कि मुंबई हमले से पहले मिली अहम खुफिया सूचनाओं की उपेक्षा की गई थी. ये सूचनाएं देश की अलग-अलग खुफिया एजेंसियों की फाइलों में दबी रह गईं थीं. प्रधानमंत्री ये भी जानते थे कि 26 नवंबर को मुंबई हमले के दो महीने पहले से मिल रही खुफिया जानकारियों का अगर ठीक से विश्लेषण किया जाता तो वरिष्ठ अधिकारियों को साफ पता चल जाता कि आतंकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई आएंगे और फाइवस्टार होटलों को निशाना बनाएंगे.
मगर ये जानकर आप चौंक जाएंगे कि मुंबई हमले के दौरान आतंकियों ने जिन मोबाइल फोन्स का इस्तेमाल किया उनके सिमकार्ड भारतीय एजेंसियों द्वारा ही लश्कर-ए-तोएबा तक पहुंचाए गए थे. एक सीक्रेट मिशन के तहत किए गए इस काम का मकसद था इन नंबरों की निगरानी के जरिए आतंकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखना. इस मिशन के पहले हिस्से को भारतीय एजेंसियों ने सफलता से अंजाम दिया. मगर विंडबना देखिए कि नजर रखने वाली आंखों को इसके बाद नींद आ गई.
नई दिल्ली स्थित उच्च पदस्थ सूत्रों से तहलका को एक सीक्रेट नोट के बारे में जानकारी मिली है जो मुंबई हमले से कम से कम पांच दिन पहले इंटेलीजेंस ब्यूरो यानी आईबी को भेजा गया था और जिसमें 35 मोबाइल फोन नंबरों का जिक्र किया गया था. नोट के मुताबिक लश्कर के कार्यकर्ताओं ने इनमें से 32 नंबरों के सिमकार्ड्स कोलकाता और तीन के दिल्ली से खरीदे थे और इन्हें नवंबर के मध्य तक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुंचा दिया गया था.
इस सीक्रेट नोट में जो कहा गया है उससे ज्यादा सीधा संकेत और कुछ नहीं हो सकता -‘नीचे दिए गए नंबर कोलकाता से खरीदे गए हैं और कश्मीर में मौजूद पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकियों के जरिए उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर पहुंचाया गया है। हो सकता है कि बाद में देश के दूसरे हिस्सों में इन नंबरों का इस्तेमाल हो. इन नंबरों पर निगरानी रखने की जरूरत है.’ नोट में आगे कहा गया है, ‘निगरानी के अलावा इन नंबरों पर होने वाली बातचीत, इनकी वर्तमान स्थिति और इनके कॉल डीटेल्स की जानकारियां जुटाना भी जरूरी है ताकि इस सूचना की दिशा में आगे बढ़ा जा सके. निगरानी कोलकाता से संभव है.’

तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक इंटेलीजेंस ब्यूरो को ये अहम सूचना 21 नवंबर यानी मुंबई हमले से पांच दिन पहले ही मिल चुकी थी. प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी जानते हैं कि पूरे पांच दिनों तक इस सूचना पर कोई अमल नहीं हुआ यानी इन नंबरों की कोई निगरानी नहीं हुई. ये भूल इसलिए और भी गंभीर हो जाती है कि इन सभी नंबरों में से कम से कम तीन ऐसे थे जिनका इस्तेमाल मुंबई पर हमला करने वाले आतंकियों ने पाकिस्तान में मौजूद अपने आकाओं से संपर्क में रहने के लिए किया था.
तर्क दिया जा सकता है कि हो सकता है आतंकियों ने मुंबई पहुंचने के बाद ही इन नंबरों को एक्टिवेट किया हो. मगर उससे इस लापरवाही की गंभीरता जरा भी कम नहीं होती कि ये पता होने पर भी कि सिमकार्ड्स आतंकियों को भेजे गए हैं, उन नंबरों की निगरानी नहीं की गई.
आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में बोलते हुए शायद प्रधानमंत्री के दिमाग में यही बात सबसे ऊपर थी. शायद तभी उन्होंने जोर देकर कहा कि हर तरह की खुफिया सूचना कार्रवाई के लायक होती है और ये उस सूचना पर काम करने वाले की क्षमता और चतुराई पर निर्भर करता है कि क्या वह पहेली जसी सूचना एक ऐसी संपूर्ण जानकारी में बदल सकती है जिसके आधार पर कार्रवाई की जा सके. प्रधानमंत्री को इस बात का अहसास था कि मुंबई हमले से जुड़ी अहम सूचना पहले से ही उपलब्ध थी जिसका अगर ठीक से विश्लेषण किया जाता तो हमले को रोका जा सकता था. मगर एजेंसियां इन अहम नंबरों की निगरानी करने में नाकाम रहीं.
पिछले साल 18 सितंबर को रिसर्च एंड एनालिसस विंग (रॉ) ने सेटेलाइट फोन पर हुई एक बातचीत रिकॉर्ड की थी जिससे साफ संकेत मिलता था कि गेटवे ऑफ इंडिया स्थित एक होटल को निशाना बनाने की तैयारी हो रही है. इस बातचीत से ये भी पता चलता था कि हमले के लिए समुद्री रास्ते का इस्तेमाल हो सकता है. 24 सितंबर को फिर से रॉ ने एक बातचीत रिकॉर्ड की. इस बार तो होटलों के नाम का भी उल्लेख हुआ था और इनमें ताज, सी रॉक और मैरियट शामिल थे. यानी साफ हो गया था कि मुंबई में होटलों पर हमला होगा और इसके लिए समुद्र का इस्तेमाल किया जाएगा.
चूक सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी. 19 नवंबर को रॉ ने फिर से एक बातचीत रिकॉर्ड की जिसमें एक शख्स कह रहा था, ‘हम 9 से 11 बजे के बीच मुंबई पहुंचेंगे.’ हड़बड़ाए अधिकारियों ने उस शख्स की स्थिति का पता लगाने की कोशिश की और पता चला कि वह मुंबई के पास स्थित समुद्री क्षेत्र में कहीं मौजूद था. रॉ ने ये अहम सूचना इंटेलीजेंस ब्यूरो को भेजी जिसने इसे संबंधित नौसेना अधिकारियों को भेज दिया.
मगर इसके बावजूद आतंकी मुंबई पहुंचने में कामयाब हो गए. उन्होंने एमवी कुबेर नाम के एक ट्रॉलर का अपहरण किया और मुंबई के दक्षिणी हिस्से में स्थित बधवार पार्क पर उतरे. विडंबना देखिए कि समय लगभग वही रहा जो उन्होंने तय किया था यानी रात 9 से 11 बजे के बीच. बल्कि देखा जाए तो वे इससे थोड़ा पहले ही पहुंच गए थे. विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को सबूतों की जो फाइल सौंपी है उसमें आतंकवादियों के मुंबई पहुंचने का वक्त रात के साढ़े 8.30 बजे बताया गया है. इसके मुताबिक आतंकियों ने एमवी कुबेर नाम के जिस ट्रॉलर का अपहरण किया था वह 26 नवंबर को शाम चार बजे मुंबई से चार नॉटिकल माइल्स की दूरी पर पहुंचा. अंधेरा होने पर आतंकियों के सरगना इस्माइल खान ने पाकिस्तान में मौजूद अपने आका से संपर्क किया जिसने उसे कुबेर के कप्तान अमर सिंह सोलंकी को खत्म करने का निर्देश दिया. सोलंकी की हत्या करने के बाद आतंकी अपने हथियारों के साथ एक बोट में सवार हुए और लगभग सवा घंटे में चार ना¬टिकल माइल्स की दूरी तय करके बधवार पार्क पहुंच गए.
अगर सीक्रेट नोट के मिलते ही सक्रियता दिखाते हुए नंबरों की निगरानी का काम शुरू कर दिया जाता तो हो सकता था कि आतंकियों के इन नंबरों के एक्टिवेट होते ही उनका पता चल जाता.
मगर सूत्रों के मुताबिक सीक्रेट नोट और उसमें दिए गए नंबरों का तो किसी को ख्याल ही नहीं था. अजमल कसाब और उसके साथियों द्वारा सीएसटी में 58 लोगों और एटीएस मुखिया हेमंत करकरे सहित दो अधिकारियों की हत्या और नरीमन हाउस, ताज और ओबेरा¬य पर कब्जा जमा लेने के बाद आईबी में किसी की तंद्रा टूटी और उसे ध्यान आया कि कुछ दिन पहले कोई जानकारी आई थी जिसमें कुछ नंबरों का जिक्र था. आनन-फानन में कोलकाता फोन घुमाया गया. जो पता चला उससे सबके होश उड़ गए. निगरानी के लिए भेजे गए उन 35 नंबरों में से कम से कम तीन ऐसे थे जिनका मुंबई में मौत की बरसात कर रहे आतंकी इस्तेमाल कर रहे थे.
तब कहीं जाकर मुंबई पुलिस को खबरदार किया गया और इन नंबरों पर हो रही बातचीत को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया शुरू की गई. पाकिस्तान को सौंपे गए सबूतों में इस बात पर जोर दिया गया है कि वहां स्थित अपने आकाओं के संपर्क में रहने के लिए आतंकी मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे थे. सबूतों की फाइल में एक जगह पर कहा गया है, ‘अलग-अलग इमारतों पर कब्जा करने के बाद और सुरक्षा बलों से मुठभेड़ के दौरान भी आतंकी मोबाइल फोन पर अपने आकाओं के संपर्क में थे. उन्होंने बंधकों/पीड़ितों के फोन का भी इस्तेमाल किया.’
ताज होटल पर कब्जे के कुछ देर बाद ही भारतीय एजेंसियों ने आतंकियों के मोबाइल फोन पर होने वाली बातचीत रिकॉर्ड की थी. इसके कुछ अंश सबूतों की फाइल में भी हैं. बातचीत को आतंकियों की स्थिति और समय के आधार पर सूचीबद्ध किया गया है. इसे देखकर पता चलता है कि रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया 26 नहीं बल्कि 27 नवंबर यानी हमले के दूसरे दिन शुरू हुई. मसलन बातचीत का नीचे दिया गया हिस्सा 27 नवंबर को रात एक बजकर 26 मिनट पर रिकॉर्ड किया गया है.
कॉलर- आग लगा रहे हो या नहीं?
रिसीवर- अभी नहीं, मैं मैट्रेस को जलाने लायक बना रहा हूं.
कॉलर- तुमने लाश के साथ क्या किया? (इशारा शायद कुबेर के कप्तान सोलंकी की तरफ है)
रिसीवर- वहीं छोड़ दिया.कॉलर- क्या तुमने पानी के लिए ला¬क खोले थे (ट्रॉलर के तल पर स्थित ला¬क जिनके खुल जाने पर पानी भीतर आ सकता है और ट्रॉलर डूब
सकता है.)रिसीवर- नहीं, लॉक नहीं खोले थे. जल्दबाजी में हमने उन्हें वसे ही छोड़ दिया. हमसे एक बड़ी गलती हो गई.
कॉलर- बड़ी गलती? क्या?
रिसीवर- जब हम बोट में सवार हो रहे थे तो लहरें काफी ऊंची थीं. एक दूसरी नाव दिखाई दी. सब कहने लगे कि नेवी वाले आ गए. जल्दबाजी में सब(ट्रॉलर से) कूद गए. इस हड़बड़ी में इस्माइल का सेटेलाइट फोन छूट गया.
गलती करने वाले आतंकी अकेले नहीं थे. भारतीय खुफिया एजेंसियां भी इस मामले में कदम-कदम पर उनके साथ थीं. इस बातचीत से साफ हो जाता है कि आतंकियों के आका अगर मुंबई में भी उनसे संपर्क रख पाए तो इसलिए क्योंकि उनकी योजना में भारत से सिमकार्ड्स जुटाना भी शामिल था. दुर्भाग्य से खुफिया एजेंसियों के पास इन नंबरों की जानकारी थी मगर इन पर नजर नहीं रखी गई.
लापरवाही भरा यही रवया भारत को एक आसान शिकार बना देता है.
गुप्त अभियान आतंकियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाने की दिशा में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं. इस मामले में अभियान के पहले हिस्से यानी लश्कर तक सिमकार्ड्स पहुंचाने के काम को तो सफलता से अंजाम दिया गया मगर लापरवाही के चलते दूसरे हिस्से यानी इन सिमकार्ड्स की निगरानी की उपेक्षा हो गई.
विडंबना ही है कि आत्ममंथन और गलती स्वीकारने व सुधारने की बजाय दोष एक दूसरे पर थोपने का सिलसिला शुरू हो गया है. सिमकार्ड्स उपलब्ध करवाने के लिए आईबी, जम्मू और कश्मीर पुलिस को दोषी ठहरा रही है. जबकि सच ये है कि जम्मू और कश्मीर पुलिस ने तो अपना काम करते हुए इन नंबरों की जानकारी आईबी तक पहुंचा दी थी जो इनकी निगरानी नहीं कर पाई. सिमकार्ड्स के लिए श्रीनगर से कोलकाता जाने वाले जम्मू और कश्मीर पुलिस के कांस्टेबल मुख्तार अहमद को जेल में डाल दिया गया. इतना ही नहीं आनन-फानन में सारे मोबाइल नंबरों को निगरानी पर रखने की बजाय (जिससे कोई दूसरी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती थी) अस्थायी तौर पर निष्क्रिय कर दिया गया.
मुंबई हमले के बाद सरकार ने अपने विश्वसनीय सबूतों के साथ पाकिस्तान के खिलाफ व्यापक कूटनीतिक अभियान छेड़ दिया है. ऐसा ही एक व्यापक अभियान खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली की दिशा में भी छेड़े जाने की जरूरत है ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि अलग-अलग एजेंसियां मिलजुलकर एक मकसद के लिए काम करें.