टाटा हालांकि फिलहाल एक दूसरी वजह से चर्चा में है, लेकिन यह घराना देश के औद्योगिक क्षेत्र में अपने खरेपन और ईमानदारी के लिए जाना जाता रहा है। जिस देश में नगरपालिका से लेकर न्यायिक क्षेत्र तक कमोबेश भ्रष्टाचार के उदाहरण सामने आ रहे हों, वहां ईमानदारी एक अपवादस्वरूप गुण ही है। इसलिए टाटा के प्रमुख रतन टाटा ने पिछले दिनों जो एक टिप्पणी की, वह सचमुच महत्वपूर्ण है। हाल ही में रतन टाटा ने देहरादून में उत्तराखंड स्थापना दिवस स्मारक व्याख्यान देते हुए अपने जीवन के कई अछूते प्रसंग सुनाए। इनमें से एक यह था कि किस प्रकार टाटा एयरलाइंस शुरू करने में सरकार में बैठे बड़े लोगों ने अड़ंगे लगाए। ऐसा संकेत मिलता है कि एक मंत्री ने टाटा एयरलाइंस शुरू करने की अनुमति देने के लिए उनसे 15 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी। तीन प्रधानमंत्री और तीन नागरिक उड्डयन मंत्री इस दौरान बदल गए। रतन टाटा ने बताया कि उन्होंने तीनों प्रधानमंत्रियों से अपने इस प्रस्ताव के बारे में बात की थी, लेकिन मामला अटक गया और उन्होंने तय किया कि रिश्वत नहीं देंगे।
रतन टाटा के इस अनुभव ने हम सभी देशवासियों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। हमारे इर्द-गिर्द हजारों ऐसे उदाहरण प्रतिदिन घटते हैं, जिनमें साधारण से साधारण काम भी सामान्य व्यक्ति रिश्वत देकर कराने पर मजबूर होता है। पिछले दिनों मैं एक वरिष्ठ जनजातीय नेता के साथ था। उनसे चर्चा चली कि देश में 95 प्रतिशत विद्रोह और आतंकवाद के मामले केवल जनजातीय क्षेत्रों में ही क्यों मिलते हैं? उनका उत्तर था, ‘जनजातीय क्षेत्रों में न तो अच्छे अध्यापक होते हैं, न अच्छे विद्यालय। आम जनजातीय व्यक्ति शहरी अफसरों और नेताओं के भ्रष्टाचार से परिचित नहीं होता। उसे अगर अपना आवासीय प्रमाणपत्र लेना हो या गरीबी रेखा से नीचे का दस्तावेज बनवाना हो, तो दस से लेकर हजार रुपये तक की रिश्वत लेने वाले लोग तैयार रहते हैं। जिन जनजातीय मजदूर या किसान के पास दो जून की रोटी का हिसाब-किताब नहीं होता, वह जब शहरों में धक्के खाता है, दफ्तरों में रिश्वत देने पर मजबूर होता है, तो दुखी होकर रो पड़ता है।
‘ऐसे ही परेशान समाज में नए लड़कों को माओवादी या नक्सलवादी बनाने की साजिश में शामिल कर लिया जाता है। जरूरी नहीं कि उन लोगों को माओवादियों से कोई सहानुभूति हो, लेकिन दुखी या परेशान होकर भी कुछ लोग हिंसा का रास्ता अपनाते हैं।’ यह सचमुच मर्माहत करने वाला तथ्य है। पिछले दिनों दिल्ली में पांच मंजिली इमारत गिरने से करीब 70 लोग मारे गए। बताते हैं कि वह इमारत स्थानीय इंजीनियरों तथा नगर निगम के लोगों ने रिश्वत लेकर बनने दी थी। उस इमारत की नींव कमजोर थी, इसके बावजूद स्थानीय अधिकारियों ने उस पर निर्माण कार्य की अनुमति दी थी। यह क्यों न कहा जाए कि चंद रिश्वतखोर अधिकारियों और भ्रष्ट नेताओं ने इन लगभग 70 लोगों की हत्या कर दी? भारत के स्वातंत्र्योत्तर इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय भ्रष्टाचार के एक भयानक घोटाले को दबाने के अविश्वसनीय आरोप का निशाना बना है और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा।
हाल ही में ओबामा भारत की यात्रा पर आए थे। वह उस देश के राष्ट्रपति हैं, जिसने अपने यहां एक भीषण आतंकवादी घटना होने के बाद ऐसी कोई दूसरी घटना न होने दी है। भ्रष्टाचार का जरा-सा आरोप लगते ही वहां के नेता कठघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। कितने शर्म की बात थी कि ओबामा एक ऐसे देश में आए, जहां का सारा माहौल बड़े से बड़े नेताओं के घनघोर भ्रष्टाचार के अंधेरे में घिरा हुआ है। कॉमनवेल्थ घोटाला, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, इसकी सूची बहुत लंबी है। ये तो वे उदाहरण हैं, जो अत्यंत असामान्य और अभूतपूर्व हैं। जरा उन लोगों की स्थिति का अंदाजा लगाइए, जिन्हें बच्चों के एडमिशन से लेकर रेल में आरक्षण कराने और पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी हासिल करने से लेकर बच्चों को डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई केलिए भेजने तक अफसरों, नेताओं और दलालों को पैसे खिलाने पड़ते हैं।
हिंदुस्तान का कोई जिला, कोई दफ्तर या लोकतंत्र का कोई खंभा ऐसा नहीं बचा है, जिस पर रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों के छींटे न लगे हों। पत्रकारिता का क्षेत्र कभी महान मिशनरी उद्देश्यों वाला माना जाता था। आज पत्रकारिता के शिखर संपादक और पत्रकारों के संगठन इस बात से चिंतित हैं कि उनके व्यवसाय में पेड न्यूज का जहर तीव्रता से फैलता जा रहा है। तो इस परिस्थिति में अब क्या बचा है? ऐसे परिदृश्य में कुछ लोग हैं, जो हमारी आस्था को जिंदा रखते हैं तथा इन बेईमानों से त्रस्त और दुखी भारतमाता का सिर झुकने नहीं देते। उनमें रतन टाटा अग्रणी हैं। इसी तरह चौथे खंभे के भ्रष्ट होने के इस दौर में कुछेक संवाददाता भी हैं, जो घोटालों का साहस के साथ परदाफाश करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।
तथ्य यह है कि आसपास नजर घुमाने पर हमें ईमानदार लोग ही ज्यादा मिलते हैं। लेकिन कम संख्या में होने के बावजूद बेईमान लोगों का ज्यादा मुखर होना वातावरण को गंदला बना देता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस ताजा मामले से प्रेरणा लेकर देश में नया वातावरण बनेगा और वे तमाम नेता जनाक्रोश के झाड़ू से निकाल बाहर किए जाएंगे, जो अपनी सत्ता बचाने के लिए अंगरेजों से भी ज्यादा भारत की लूट पर खामोश ही नहीं रहते, बल्कि उसमें अपनी हिस्सेदारी भी रखते हैं। इसके लिए लोगों को भी पहल करनी होगी। क्या वे इसके लिए तैयार हैं?
By:-Tarun Vijay