Tuesday, February 8, 2011

गोधरा कांड पर फैसला 19 फरवरी 2010 को

गोधरा नरसंहार घटना के करीब नौ साल बाद इस मामले में 19 फरवरी को फैसला सुनाया जाएगा। इस घटना में 58 लोगों के जलकर मर जाने के बाद समूचे गुजरात में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे।

इस मामले के विशेष सरकारी वकील जेएम पंचाल ने बताया कि मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश पीआर पटेल इस संवेदनशील मामले में 19 फरवरी को फैसला सुनाएँगे। उन्होंने इस मामले में पिछले साल सितंबर में अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों की सुनवाई पूरी कर ली थी।

इस मामले में सभी आरोपियों पर आपराधिक षड्‍यंत्र रचने, हत्या करने और साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन की एस-6 बोगी में आग लगाने का आरोप लगाया गया था। यह घटना 27 फरवरी 2002 की है, जिसके तहत 58 लोग मारे गए थे। इनमें से ज्यादातर लोग अयोध्या से लौट रहे ‘कार सेवक’ थे।

गोधरा में जो हुआ वो सभी को पता है अब फैसला भी आने वाला है/ कहा जाता है कि गोधरा-कांड एक दुर्घटना है जब कि उसके बाद होने वाले गुजरात दंगे सोची समझी साजिश थी लेकिन मै कहना चाहता हूँ कि दंगे एक प्रतिकिया थी जब कि गोधरा एक सुनियोजित साजिश थी.

गुजरात में जो कुछ हुआ उसे सही तो नहीं ठहराया जा सकता क्यों कि उसमे दोषियों के साथ साथ निर्दोष भी मारे गए  लेकिन वो क्यों हुआ हमें पहले वो देखना चाहिए और शुरुआत पहले किसने की ये देखना अति आवश्यक है      

Tuesday, January 25, 2011


    आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई!!!!! वन्दे मातरम !!!!!! 
                                                                                          



Saturday, December 4, 2010

भ्रष्टाचार के विरुद्ध

टाटा हालांकि फिलहाल एक दूसरी वजह से चर्चा में है, लेकिन यह घराना देश के औद्योगिक क्षेत्र में अपने खरेपन और ईमानदारी के लिए जाना जाता रहा है। जिस देश में नगरपालिका से लेकर न्यायिक क्षेत्र तक कमोबेश भ्रष्टाचार के उदाहरण सामने आ रहे हों, वहां ईमानदारी एक अपवादस्वरूप गुण ही है। इसलिए टाटा के प्रमुख रतन टाटा ने पिछले दिनों जो एक टिप्पणी की, वह सचमुच महत्वपूर्ण है। हाल ही में रतन टाटा ने देहरादून में उत्तराखंड स्थापना दिवस स्मारक व्याख्यान देते हुए अपने जीवन के कई अछूते प्रसंग सुनाए। इनमें से एक यह था कि किस प्रकार टाटा एयरलाइंस शुरू करने में सरकार में बैठे बड़े लोगों ने अड़ंगे लगाए। ऐसा संकेत मिलता है कि एक मंत्री ने टाटा एयरलाइंस शुरू करने की अनुमति देने के लिए उनसे 15 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी। तीन प्रधानमंत्री और तीन नागरिक उड्डयन मंत्री इस दौरान बदल गए। रतन टाटा ने बताया कि उन्होंने तीनों प्रधानमंत्रियों से अपने इस प्रस्ताव के बारे में बात की थी, लेकिन मामला अटक गया और उन्होंने तय किया कि रिश्वत नहीं देंगे।

रतन टाटा के इस अनुभव ने हम सभी देशवासियों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। हमारे इर्द-गिर्द हजारों ऐसे उदाहरण प्रतिदिन घटते हैं, जिनमें साधारण से साधारण काम भी सामान्य व्यक्ति रिश्वत देकर कराने पर मजबूर होता है। पिछले दिनों मैं एक वरिष्ठ जनजातीय नेता के साथ था। उनसे चर्चा चली कि देश में 95 प्रतिशत विद्रोह और आतंकवाद के मामले केवल जनजातीय क्षेत्रों में ही क्यों मिलते हैं? उनका उत्तर था, ‘जनजातीय क्षेत्रों में न तो अच्छे अध्यापक होते हैं, न अच्छे विद्यालय। आम जनजातीय व्यक्ति शहरी अफसरों और नेताओं के भ्रष्टाचार से परिचित नहीं होता। उसे अगर अपना आवासीय प्रमाणपत्र लेना हो या गरीबी रेखा से नीचे का दस्तावेज बनवाना हो, तो दस से लेकर हजार रुपये तक की रिश्वत लेने वाले लोग तैयार रहते हैं। जिन जनजातीय मजदूर या किसान के पास दो जून की रोटी का हिसाब-किताब नहीं होता, वह जब शहरों में धक्के खाता है, दफ्तरों में रिश्वत देने पर मजबूर होता है, तो दुखी होकर रो पड़ता है।

‘ऐसे ही परेशान समाज में नए लड़कों को माओवादी या नक्सलवादी बनाने की साजिश में शामिल कर लिया जाता है। जरूरी नहीं कि उन लोगों को माओवादियों से कोई सहानुभूति हो, लेकिन दुखी या परेशान होकर भी कुछ लोग हिंसा का रास्ता अपनाते हैं।’ यह सचमुच मर्माहत करने वाला तथ्य है। पिछले दिनों दिल्ली में पांच मंजिली इमारत गिरने से करीब 70 लोग मारे गए। बताते हैं कि वह इमारत स्थानीय इंजीनियरों तथा नगर निगम के लोगों ने रिश्वत लेकर बनने दी थी। उस इमारत की नींव कमजोर थी, इसके बावजूद स्थानीय अधिकारियों ने उस पर निर्माण कार्य की अनुमति दी थी। यह क्यों न कहा जाए कि चंद रिश्वतखोर अधिकारियों और भ्रष्ट नेताओं ने इन लगभग 70 लोगों की हत्या कर दी? भारत के स्वातंत्र्योत्तर इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय भ्रष्टाचार के एक भयानक घोटाले को दबाने के अविश्वसनीय आरोप का निशाना बना है और वह भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा।

हाल ही में ओबामा भारत की यात्रा पर आए थे। वह उस देश के राष्ट्रपति हैं, जिसने अपने यहां एक भीषण आतंकवादी घटना होने के बाद ऐसी कोई दूसरी घटना न होने दी है। भ्रष्टाचार का जरा-सा आरोप लगते ही वहां के नेता कठघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। कितने शर्म की बात थी कि ओबामा एक ऐसे देश में आए, जहां का सारा माहौल बड़े से बड़े नेताओं के घनघोर भ्रष्टाचार के अंधेरे में घिरा हुआ है। कॉमनवेल्थ घोटाला, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, इसकी सूची बहुत लंबी है। ये तो वे उदाहरण हैं, जो अत्यंत असामान्य और अभूतपूर्व हैं। जरा उन लोगों की स्थिति का अंदाजा लगाइए, जिन्हें बच्चों के एडमिशन से लेकर रेल में आरक्षण कराने और पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी हासिल करने से लेकर बच्चों को डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई केलिए भेजने तक अफसरों, नेताओं और दलालों को पैसे खिलाने पड़ते हैं। 

हिंदुस्तान का कोई जिला, कोई दफ्तर या लोकतंत्र का कोई खंभा ऐसा नहीं बचा है, जिस पर रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों के छींटे न लगे हों। पत्रकारिता का क्षेत्र कभी महान मिशनरी उद्देश्यों वाला माना जाता था। आज पत्रकारिता के शिखर संपादक और पत्रकारों के संगठन इस बात से चिंतित हैं कि उनके व्यवसाय में पेड न्यूज का जहर तीव्रता से फैलता जा रहा है। तो इस परिस्थिति में अब क्या बचा है? ऐसे परिदृश्य में कुछ लोग हैं, जो हमारी आस्था को जिंदा रखते हैं तथा इन बेईमानों से त्रस्त और दुखी भारतमाता का सिर झुकने नहीं देते। उनमें रतन टाटा अग्रणी हैं। इसी तरह चौथे खंभे के भ्रष्ट होने के इस दौर में कुछेक संवाददाता भी हैं, जो घोटालों का साहस के साथ परदाफाश करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।

तथ्य यह है कि आसपास नजर घुमाने पर हमें ईमानदार लोग ही ज्यादा मिलते हैं। लेकिन कम संख्या में होने के बावजूद बेईमान लोगों का ज्यादा मुखर होना वातावरण को गंदला बना देता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस ताजा मामले से प्रेरणा लेकर देश में नया वातावरण बनेगा और वे तमाम नेता जनाक्रोश के झाड़ू से निकाल बाहर किए जाएंगे, जो अपनी सत्ता बचाने के लिए अंगरेजों से भी ज्यादा भारत की लूट पर खामोश ही नहीं रहते, बल्कि उसमें अपनी हिस्सेदारी भी रखते हैं। इसके लिए लोगों को भी पहल करनी होगी। क्या वे इसके लिए तैयार हैं?
By:-Tarun Vijay








Thursday, December 2, 2010

भारत में दुश्मन को जवाब देने का दम नहीं

भारत को दुश्मन को जवाब देने का दम नहीं है,  विकिलीक्स का कहना है कि
भारत हमले बस सह सकता है। उसमें पलटवार करने का दम नहीं है। भारत की 'कोल्ड स्टार्ट' योजना बस कागजों तक सीमित है। ऐसा न होता तो वह 26/11 के बाद इसके लिए जिम्मेदार पाक को मुंहतोड़ जवाब दे देता...। अमेरिका भारत के बारे में कुछ यही सोचता है। विकिलीक्स की ओर से लीक किए गए एक संदेश से अमेरिका की इस सोच का पता चलता है।

भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी जे रोमर ने कहा था कि संसाधनों की कमी के कारण भारत के युद्ध के मैदान में अपनी 'कोल्ड स्टार्ट' योजना पर अमल करने की उम्मीद नहीं है। रोमर ने इस योजना को मिथक करार दिया था। रोमर ने कहा कि भारतीय थलसेना ने यदि कोल्ड स्टार्ट योजना मौजूदा स्वरूप में लागू की, तो इसके इसके मिश्रित नतीजे सामने आएंगे। 


"कोल्ड स्टार्ट वह योजना है जिसके तहत देश में आतंकी हमला होने पर 72 घंटों में दुश्मन देश पर हमला कर उसके आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूत किया जा सकता है। भारत ने यह योजना 2004 में बनाई, लेकिन 2008 में मुंबई पर हमला होने के बावजूद उसे अमल में नहीं लाया गया। "


गौरतलब है कि इस सिद्धांत पर भारत में सहमति नहीं बन पाई है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने भी इसे पूरी तरह समर्थन नहीं दिया है।

रोमर ने यह भी कहा कि भारत ने 26-11 जैसा आतंकवादी हमला होने के बाद भी कोल्ड स्टार्ट सिद्धांत पर अमल नहीं किया। जबकि इस वारदात में शामिल आतंकवादियों के तार पाकिस्तान से सीधे जुड़े हुए थे।

लीक हुए इस संदेश में कहा गया है कि हमला होने के बाद भी भारत सरकार ने कोल्ड स्टार्ट योजना पर अमल नहीं किया, जो इसे किसी भी स्वरूप में लागू करने की दिशा में भारत सरकार की इच्छा को दिखाता है। इस योजना का अस्तित्व में रहना बस 
भारत की जनता को आश्वस्त करना है और पाकिस्तान पर कुछ दबाव बनाना है।

Friday, March 20, 2009

चुनाव भारत-भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर हैं

पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के प्रति समर्पित राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत हैं
पार्टी और विचारधारा को तिलांजलि देकर राजनेता चुनाव की इस तरह तैयारियां कर रहे दिखते हैं मानो भारत की संसद में प्रवेश राष्ट्र पर छाए संकटों के समाधान के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत ऐश्वर्य और सत्ता सुख में हिस्सेदारी के लिए हो। जिस प्रकार टिकटों की बिक्री और चुनाव खर्च के लिए इकट्ठा किए जा रहे धन का ब्यौरा सामने आ रहा है उससे तो यही अंदाजा लगता है कि देश अभी भी उन राजनेताओं की प्रतीक्षा में है जो चुनावी अखाड़े को पूंजी निवेश का लाभप्रद क्षेत्र मानने के बजाय अपने हितों को दांव पर लगाते हुए राष्ट्रीय हितों को आंखों में धारण कर सत्ता के सूत्र संभालेंगे। भारत विभाजन के बाद से आज तक राजनीति दुराचरण के धब्बों से कलंकित रही है। 1947 में जब भारतीय सैनिक कश्मीर पर अचानक धोखे से हुए पाकिस्तानी हमले झेल रहे थे तो लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्णामेनन से जुड़ा जीप घोटाला हुआ। फिर मूंदड़ा कांड, नागरवाला और बोफोर्स कांड, सुखराम मामला, चारा घोटाला, तहलका, पनडुब्बी खरीद, गेहूं आयात घोटाला जैसे प्रकरण राजनेताओं की साख पर आंच डालते रहे।
एक ओर सामान्य नागरिक दुनिया भर में अपनी व्यक्तिगत मेधा और निपुणता के बल पर भारतीय पहचान को श्रेष्ठता का सर्वोच्च स्थान दिला रहे थे और भारतीय कंपनियां विश्वविख्यात ब्रांड अधिग्रहीत कर रही थीं तो दूसरी ओर राजनेता बोरियां भर-भर कर नोट इकट्ठा कर अपनी आत्मा के बजाय तिजोरी के निर्देश पर भारतीय संसद में सांसद धर्म निभाने का परिदृश्य उपस्थित कर रहे थे। क्या ऐसे टिकाऊ और बाजारू लोगों के सौदों पर टिकी सरकार चुनना राष्ट्रहित में होगा? जिस देश की प्रजा अपने शासक को चुनने में लापरवाही बरते या उसका चुनाव जाति, भाषा और धनबल के प्रभाव की कसौटी पर करे, क्या उसका कभी अच्छा परिणाम निकल सकता है?
कुछ ऐसी स्थिति पिछली शती के प्रारंभ में ब्रिटेन में थी, जब हाउस आफ ला‌र्ड्स की सीटें नीलाम हुआ करती थीं। फिर भी वहां की जनता ने अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को बदला और एक ऐसे प्रजातंत्र का ढांचा मजबूत किया जो राज-वंश भी परंपरागत रूप से जीवित रखे हुए है और जहां प्रखर राष्ट्रवाद हर नीति को निर्देशित करता है। अमेरिका और चीन भी भले ही परस्पर अत्यंत भिन्न समाज हों, लेकिन अपने देश को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ, समृद्ध और शक्तिशाली बनाना वहां की राजनीति का मुख्य धर्म परिलक्षित होता है। भारत के सामने आसन्न चुनावों ने यह चुनौती उपस्थित की है कि जनता ऐसे सांसदों को चुने जो राष्ट्र-धर्म के प्रति सजग और प्रतिबद्ध हों। दुर्भाग्य से वर्तमान चुनाव पद्धति में सिर्फ जीतना ही एकमात्र कसौटी है, चरित्र और गुण का स्थान यदि कभी आया भी तो बाद में आता है। फलत: ऐसे सांसद चुने जाते हैं जिन्हें न अपने देश के इतिहास का ज्ञान होता है, न भूगोल का और न ही राष्ट्रीय संघर्ष के विभिन्न सोपानों से वे परिचित होते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनसे पहले भी अनेक मंत्री हो चुके हैं, जिनमें से कोई भी अपने धनबल और असीम ऐश्वर्य के कारण यशस्वी नहीं हुआ। केवल पैसा और पद कभी प्रतिष्ठा नहीं दिला सकते।
जिन लोगों को सत्ता के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के बाबू और रायबहादुर बनने में शर्म नहीं आई, वैसे ही लोग आज विदेशी हितों और विदेशी मूल के नेतृत्व के सामने झुककर राष्ट्रीयता दांव पर लगा रहे हैं। जिस देश में पांच लाख देशभक्त नागरिक निर्वासित कर दिए गए हों, जहां एक करोड़ से अधिक विदेशी अवैध घुसपैठिए वोट बैंक राजनीति का संरक्षण पा रहे हों, जहां शासक को पुलिस, प्रशासन और चुनाव पद्धति में सुधार की कोई आवश्यकता ही महसूस न हो, बल्कि ब्रिटिश काल के कानून आज भी देश में लागू हों, ऐसे देश में यथास्थिति के दब्बूपन के बजाय जन-विद्रोह के परिवर्तनकारी स्वर बुलंद होने चाहिए। देश को ऐसी राजनीति चाहिए जो शत्रु के प्रति निर्गम और प्रतिशोधी हो, जो देश को सैन्य दृष्टि से विश्व में सबसे सबल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो तथा नि:संकोच भाव से अपने अगल-बगल के क्षेत्र पर ऐसा प्रभुत्व स्थापित करे ताकि वहां की अराजकता और तालिबानी शरारतों का हम पर असर न पड़े। चारों ओर से पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे असफल और अराजकता ग्रस्त देशों से घिरे भारत को आंतरिक और सीमावर्ती शांति के लिए ऐसा सैन्य और कूटनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना ही होगा जिसे देखकर विरोधी भयभीत रहें। आज तो पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं, श्रीलंका व नेपाल तक हमारी सुरक्षा और संवेदना की कद्र नहीं करते।
चीन के बढ़ते क्षेत्रीय विस्तार के प्रति राजनीतिक दलों में कोई दीर्घकालिक सर्वसम्मत चिंतन ही नहीं है। तीस करोड़ से अधिक भारतीय आज भी गरीबी रेखा से नीचे पशुवत जीवन बिताने पर विवश हैं। गत दस वर्षों में दो लाख किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। खेती में रासायनिक खाद और जीन अंतरित बीज के जहर फैल रहे हैं। देश की कृषि योग्य भूमि पर सिनेमा, होटल और कारखाने लगाने की अनुमति देकर अमीरों को और ज्यादा अमीर तथा भूमिपति किसानों को स्लमडाग बनाया जा रहा है। ऐसे ही सांसद फिर चुने जाएं तो किस प्रकार के भारत का वे निर्माण करेंगे? भारत एक ऐसे नेतृत्व की प्रतीक्षा में है जो सबसे बड़ा तीर्थत्व गुण और शक्ति संचय में माने, जिसके प्रेरणा केंद्र और मन भारत में हों, जो दरिद्रता निवारण और विज्ञान-प्रौद्योगिकी प्रसार को देवालय निर्माण जैसा महत्वपूर्ण माने, जिसके सर्वोच्च आराध्य भारत के नागरिक हों। वर्तमान चुनाव हमें भारत भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर दे रहे हैं-एक ऐसा भारत भाग्य विधाता चुनें जो सच में जन-गण-मन का अधिनायक बन सके।

क्या हम परिवर्तन के लिए तैयार हैं?
लेखक - तरुण विजय

क्या तालिबान के ताण्डव से बच पायेगा हिन्दुस्तान?


जिस तरह से तालिबान और पाकिस्तान शासन में बैठे तालिबानी शासक पुरे पाकिस्तान को लगभग तालिबानिस्तान बना दिया है। आज पाकिस्तान का स्थिती ऎसा है कि वहाँ रह रहे मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग इस्लाम के नाम पर तालिबान का खुले आम समर्थन कर रहें है और वहाँ का सरकार भी आँख बन्द कर समर्थन कर रहा है। और पाकिस्तान से बाहर रह रहें मुस्लिम समप्रदाय भी किसी न किसी तरह तालिबान का समर्थन कर ही रहा है। तालिबान का सपना है पुरे विश्व को दारुल इस्लाम बनाने का इसके लिये इसके लिये तालिबान गैर इस्लामिक समुदाय को या तो डरा-धमका कर इस्लाम कबूलबा कर या फिर मौत के घाट उतार कर दारुल इस्लाम का सपना साकार करने में लगा है।
हिन्दुस्तान के दो परोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनो देश में इस्लाम का शासन है बांग्लादेश जब पाकिस्तान के आतंक से त्रस्त था तब हिन्दुस्तान के शरण में आया था लेकिन आजादी के कुछ दिन बाद से बांग्लादेश को अपने इस्लामिक भाईचारा का ख्याल हो आया और हिन्दुस्तान का साथ छोड़ इस्लामिक भाई पाकिस्तान का दामन थाम लिया और पाकिस्तान का कसम हिन्दुस्तान को बर्बाद करके दम लुगा को सार्थक करने में लग गया। और किसी ना किसी तरह से हिन्दुस्तान को परेशान करने लगा चाहे जिहाद हो, आंतकवाद हो, नकली नोट या फिर बांग्लादेशी नागरीक को अवैध रुप से हिन्दुस्तान में भेज कर मुग्लिस्तान बनाने में पाकिस्तान का सहयोग देना हो। इन सब स्थिती में हिन्दुस्तान क्या करेगा।
हिन्दुस्तान में राजनीतिक दल मुस्लमानों के चन्द वोट के चलते हिन्दुस्तान के आने वाले खतरे को हमेशा से अनदेखा करते रहें है। जब भाजपा सरकार आयी थी तो आतंकवाद विरोधी कानुन टाडा और पोटा लगाया था जिसको की कांग्रेस की सरकार ने मुस्लमानों के दवाब के चलते हटा दिया। आतंकवाद निरोधक कानून किसी एक विशेष समुदाय के लिये नही बनाया गया था ये कानून समान रुप से हिन्दु और मुस्लिम दोनो के लिये था लेकिन मुस्लमानों को इस कानून से ज्यादा समस्या था जिसके कारण कांग्रेस सरकार जब बना तो सबसे पहला काम आंतकवाद निरोधक कानून को हटाने का किया जिसका नतिजा आज पुरा हिन्दुस्तान भोग रहा है आज हिन्दुस्तान का कोई शहर, कस्बा, गाँव आतंकवादियों से सुरक्षीत नही है। कही भी कभी भी इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट किया जा सकता है। आज की तारिख में विश्व में सबसे ज्याद इस्लामिक आतंकवादी सुरक्षित है तो वह देश है हिन्दुस्तान। अफजल गुरु इसका उदाहरण है फांसी की सजा मिलने के बाद भी अफजल को कांग्रेस सरकार के द्वारा सिर्फ इस लिये फांसी नही दिया कि इस से मुस्लिम समुदाय खफा हो जायेगा और कांग्रेस को वोट नही देगा। हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लमानों का किसी ना किसी रुप से इस्लामिक आंतकवाद को सर्मथन दिया जा रहा है। पाकिस्तान तो सिर्फ अपने यहाँ आतंकवादियों को विस्फोट करना सिखाया जाता है लेकिन हिन्दुस्तान में आकर उसी आतंकवादि को हर तरह का सुविधा मुहय्या किया जाते है। इस्लामिक आतंकवाद हिन्दुस्तान में आकर कही भी घर लेकर रह सकता है और उसको सहयोग करने वाले और विस्फोट के बाद बचाव करने वाले लगभग हर राजनितीक दल में मौजुद है और उनके समर्थक खुले आम घुम रहें हैं और चुनाव के दिन मुस्लिम समुदाय सिर्फ उन्ही दल को वोट देता है जिनके आने से आतंकवाद और हिन्दुस्तान को दारुल इस्लाम बनाने में सहयोग मिलता रहें।
तालिबान के पाकिस्तान और बांग्लादेश पर कब्जा करने के बाद तालिबान क्या चुप बैठेगा। शायद नही उसका अगला निशाना जरुर हिन्दुस्तान होगा। और हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लिम समुदाय इस्लामिक भाईचारा के नाम पर हो सकता है कि वे तालिबानियों के साथ करें हो जायें क्यों की आजादी के इतने सालों बाद भी मुस्लमानों का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा है हिन्दुस्तान से इसका उदाहरण है क्रिकेट का मैच जब भी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का मैच होता है तो मुस्लिम समुदाय हमेशा से पाकिस्तान के सर्मथन में खरा रहता है। अभी कुछ दिन पहले जब हिन्दुस्तान 20-20 का विश्व कप के फाइनल में पाकिस्तान को औकाद बता कर 20-20 विश्व चैंम्पियन बना तो हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लिम समुदाय को पाकिस्तान का हिन्दुस्तान के हाथों हारना नागावार लगा जिसका नतिजा कई जगह दंगा भड़का। जब हिन्दुस्तान में तालिबान का इस्लामिक ताण्डव भडकेगा उस स्थिती में हमारे देश के शासक और हमारा फौज क्या इस स्थीती में रहेगा कि तालिबानीयों से और हिन्दुस्तान में रह रहें तालिबानी सर्मथको से लोहा ले सकेगा। कांग्रेस के इस पाँच साल के शासन काल में हम लोगों ने देखा की हिन्दुस्तान से नेपाल जैसा पिद्दी सा देश भी नही डरा। मुम्बई धमाका के बाद कि स्थिती तो हिन्दुस्तान के शासको के लिये हास्यपद बन गया है पाकिस्तान हिन्दुस्तान को लतिया रहा है और हमारे शासक नित्य नयें बहाने बना कर मुम्बई हमालाबरों को बचाने के कोशीश कर रहें हैं तो क्या हमारे मुस्लिम चापलुस शासको के पास इतना हिम्मत होगा की तालिबान का सफाया हमारे देश से कर सकें।
सोचों